रामायण – बालकाण्ड (भाग -4)

बालकाण्ड (भाग -4)

दो0 गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।
अयमय खांड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।275।।
व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र ने हृदय में हँसकर कहा कि मुनि को हरा ही हरा दिखायी पड़ रहा है। अर्थात् आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी लक्ष्मण को साधारण भाव ही समझ रहे हैं। जबकि आत्म भाव और अन्य भावों में वैसा ही अन्तर होता है, जैसे लोहे की बनी हुए खांड यानी खड़ग-खांडा और गन्ने की बनी हुई खाँड में होता है। मुनि अभी भी इस बात से अनिभज्ञ हैं।
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा।।
माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जी कें।।